जब कहावतें इतिहास बन जाती हैं: मेवात की लोक बुद्धि, अंग्रेज़ी किताबें और आज की बदलती दुनिया




समय के साथ केवल इंसान नहीं बदलते, उनकी भाषा भी बदलती है, उनके पहनावे बदलते हैं, उनके खाने का स्वाद बदलता है और धीरे-धीरे उनकी कहावतें भी लोगों की यादों से गायब होने लगती हैं। आज का बच्चा Mobile Phone चलाना जानता है, Internet पर घंटों बिता सकता है, English के कई शब्द बोल लेता है, लेकिन अगर उससे पूछा जाए कि उसके दादा-दादी की कोई मेवाती कहावत क्या थी, तो शायद वह कुछ पल सोचने लगे। यही वह जगह है जहाँ महसूस होता है कि विकास और आधुनिकता के साथ-साथ हम अपनी लोक-स्मृतियों से भी थोड़ा-थोड़ा दूर होते जा रहे हैं। और शायद यही कारण है कि आज मेवात की कहावतों को केवल याद करने की नहीं, बल्कि उन्हें लिखकर सुरक्षित करने की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।

मेवात की कहावतें केवल दो-चार शब्दों के वाक्य नहीं हैं। वे सदियों के अनुभव का सार हैं। खेतों में मेहनत करने वाले किसान, अरावली की घाटियों में पशु चराने वाले चरवाहे, चौपालों में बैठे बुजुर्ग, दूर-दराज़ के सफ़र करने वाले व्यापारी और परिवारों की जिम्मेदारियाँ निभाने वाले लोग—हर पीढ़ी ने अपने अनुभवों को छोटे-छोटे वाक्यों में बदल दिया। यही वाक्य आगे चलकर कहावतें बने। इसलिए मेवात में किसी विवाद का जवाब कई बार लंबी बहस से नहीं, बल्कि एक सही कहावत से दे दिया जाता था। जो बात दस मिनट में समझानी मुश्किल होती थी, वह एक कहावत कुछ ही सेकंड में समझा देती थी।

पुराने मेवात की किसी चौपाल की कल्पना कीजिए। शाम ढल चुकी है। खेतों से लोग लौट आए हैं। कोई हुक्का भर रहा है, कोई पशुओं को चारा डाल रहा है और कुछ बुजुर्ग बैठकर दिनभर की बातें कर रहे हैं। तभी किसी के व्यवहार की चर्चा होती है और कोई मुस्कुराते हुए कह देता है—"गांव का सिद्ध अण गांव का जोगणा बराबर रहवां हां।" एक वाक्य, लेकिन उसके पीछे पूरी सामाजिक मनोविज्ञान छिपी हुई है। अपने गाँव का समझदार आदमी अक्सर उतनी इज्जत नहीं पाता, जितनी बाहर से आए व्यक्ति को मिल जाती है। समय बदल गया, लेकिन यह कहावत आज भी कई जगह सच दिखाई देती है।

इसी तरह जब किसी अच्छे इंसान को बुरे लोगों की वजह से नुकसान उठाना पड़ता था, तो बुजुर्ग तुरंत कहते—"गिंहूं के संग घूंण बि पिस जावे।" और जब किसी को गलत संगत से बचाने की सलाह देनी होती, तो बिना भाषण दिए बस इतना कह दिया जाता—"गिंहूं के संग बथवा लू बि पाणी लग जावे।" इन दोनों कहावतों में केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि समाज का वह अनुभव है जो पीढ़ियों तक चलता रहा। शायद यही कारण है कि मेवात की कहावतें आज भी सुनने वाले को सोचने पर मजबूर कर देती हैं।

कई बार कोई काम शुरू भी नहीं हुआ होता था और उससे पहले ही नई मांग सामने आ जाती थी। ऐसे समय में हँसते हुए कोई बुजुर्ग कह देता—"गांव बसो ना, भिखारी पहले ही आगा।" और बात वहीं समाप्त हो जाती। इसी प्रकार जब कोई व्यक्ति सामान्य समय में कोई काम न करे और जब करे तो सब कुछ बिगाड़ दे, तब मेवात की जुबान पर एक और कहावत आ जाती—"के तो रांड की रोवे ई ना, रोवे तो बाबा ही बाबा रोवे।" इन कहावतों में व्यंग्य भी है, हास्य भी है और जीवन का गहरा अनुभव भी।

लेकिन शायद सबसे दिलचस्प बात यह है कि मेवात की कहावतें केवल गांवों की चौपाल तक सीमित नहीं रहीं। उन्नीसवीं सदी में जब अंग्रेज़ अधिकारी, इतिहासकार और Ethnographers उत्तर भारत के समाज का अध्ययन कर रहे थे, तब उनकी नज़र भी मेव समाज की लोक-परंपराओं पर पड़ी। उन्होंने केवल आबादी, खेती और जातियों का विवरण ही नहीं लिखा, बल्कि उन लोक-कहावतों को भी अपनी किताबों में दर्ज किया जो उस समय लोगों की जुबान पर थीं। यही कारण है कि आज लगभग डेढ़ सौ साल बाद भी हमें उन पुस्तकों में मेव समाज की लोक-स्मृतियों की झलक दिखाई देती है।

ब्रिटिश लेखक William Crooke ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक The Tribes and Castes of the North-Western Provinces and Oudh में एक कहावत दर्ज की—"मेव का पूत बारह बरस में बदला लेता है।" उन्होंने इसका अंग्रेज़ी अर्थ भी लिखा, लेकिन इस कहावत को शब्दशः समझना सही नहीं होगा। यह उस समय की एक लोक-धारणा थी। इसका आशय यह था कि यदि किसी मेव के साथ अन्याय या अपमान हो जाए, तो वह उसे आसानी से नहीं भूलता। यदि तुरंत उत्तर देना संभव न हो, तो वह उचित समय का इंतज़ार करता है। यह कहावत उस दौर में मेवों की ग़ैरत, धैर्य और स्वाभिमान की सामाजिक छवि को दर्शाती है, न कि हर व्यक्ति के वास्तविक व्यवहार को।

कुछ वर्ष बाद एक और अंग्रेज़ विद्वान S. W. Fallon ने अपनी 1869 की पुस्तक A New Hindustani-English Dictionary with Illustrations from Hindustani Literature and Folklore में एक और प्रसिद्ध कहावत दर्ज की—"मेव मरा जब जानिए, जब तीजा हो जाए।" उन्होंने इसके साथ एक लोक-कथा भी लिखी। कहानी में एक मेव कर्ज़ से बचने के लिए अपनी झूठी मौत की खबर फैला देता है। बनिया उसे दफन होते देख लेता है और निश्चिंत होकर लौट जाता है, लेकिन बाद में मेव के साथी उसे जीवित बाहर निकाल लेते हैं। कुछ दिन बाद वही मेव बाज़ार में घूमता दिखाई देता है और बनिये के मुँह से निकल पड़ता है—"मेव मरा जब जानिए, जब तीजा हो जाए।" यह कोई प्रमाणित ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि उस समय की लोक-कथा है। फिर भी यह बताती है कि लोगों की कल्पना में मेवों की छवि जुझारू, साहसी और कठिन परिस्थितियों से निकल आने वाले लोगों की थी।

यदि इन अंग्रेज़ी पुस्तकों में दर्ज कहावतों को मेवात की स्थानीय कहावतों के साथ पढ़ा जाए, तो एक दिलचस्प चित्र सामने आता है। एक ओर मेवात के अपने बुजुर्ग जीवन के अनुभवों से कहावतें बना रहे थे, दूसरी ओर वही कहावतें और लोक-धारणाएँ विदेशी लेखकों की पुस्तकों तक पहुँच रही थीं। इसका अर्थ यह नहीं कि हर बात ऐतिहासिक सत्य है, बल्कि यह कि मेव समाज की पहचान इतनी प्रबल थी कि उसकी लोक-संस्कृति भी लोगों का ध्यान आकर्षित करती थी।

यही कारण है कि आज जब हम मेवात की कहावतों की बात करते हैं, तो हमें केवल शब्द नहीं पढ़ने चाहिए। हमें उनके पीछे छिपे समाज को समझना चाहिए। एक ऐसा समाज जहाँ इज्जत की कीमत थी, जहाँ संगत का असर समझा जाता था, जहाँ अनुभव को किताबों से ज्यादा महत्व दिया जाता था और जहाँ जीवन की सबसे बड़ी सीख किसी विद्यालय में नहीं, बल्कि किसी बुजुर्ग की एक कहावत में मिल जाती थी।

मेरा मानना है कि आधुनिक शिक्षा, Technology और English सीखना समय की आवश्यकता है और मैं स्वयं चाहता हूँ कि मेवात का हर बच्चा शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़े। लेकिन यदि वह अपनी भाषा, अपनी कहावतें, अपने लोकगीत और अपनी सांस्कृतिक विरासत से पूरी तरह कट जाएगा, तो वह अपनी पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा खो देगा। किसी भी समाज की सबसे बड़ी ताकत केवल उसका भविष्य नहीं होता, उसका अतीत भी होता है। और जिस समाज को अपनी जड़ों का ज्ञान होता है, वही समाज आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ता है।

इसी उद्देश्य से मेवात की भाषा, संस्कृति, इतिहास, लोककथाओं, कहावतों और मौखिक परंपराओं को संकलित करने का यह प्रयास जारी है। कई ऐसी बातें जो शायद कभी किसी सरकारी दस्तावेज़ में दर्ज नहीं हुईं, वे आज भी बुजुर्गों की यादों में जीवित हैं। यदि उन्हें आज नहीं लिखा गया, तो संभव है कि आने वाली पीढ़ियाँ उन्हें हमेशा के लिए खो दें। इसलिए यह केवल लेखन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक दस्तावेज़ तैयार करने की छोटी-सी कोशिश है, ताकि जब आने वाले वर्षों में कोई मेवात के इतिहास को पढ़े, तो उसे केवल राजाओं और युद्धों की कहानी ही नहीं, बल्कि उस समाज की आवाज़ भी सुनाई दे, जिसने सदियों तक अपनी पहचान को अपनी भाषा, अपनी कहावतों और अपनी लोक-स्मृतियों में सुरक्षित रखा।

लेखक: Nasir Buchiya

सांस्कृतिक शोध एवं दस्तावेज़ीकरण:
https://hindimewati.blogspot.com

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