NASA से पहले Earth और Astronomy को कैसे समझते थे खगोलविद?

क्या हजारों साल पहले भी इंसान Earth, Astronomy, Space और Stars के ऐसे रहस्यों को समझने की कोशिश कर रहा था, जिनकी खोज में आज NASA अरबों डॉलर खर्च कर रहा है? क्या बिना Telescope, Satellite और Rocket के भी कोई पृथ्वी के आकार का अनुमान लगा सकता था? इतिहास के पन्ने बताते हैं कि यह केवल कल्पना नहीं, बल्कि एक ऐसी सच्चाई है जिसने आधुनिक विज्ञान की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आज जब कोई अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी की तस्वीर अंतरिक्ष से भेजता है, तो यह हमारे लिए सामान्य बात लगती है। लेकिन सदियों पहले, जब न आधुनिक उपकरण थे, न कंप्यूटर और न ही अंतरिक्ष मिशन, तब भी कुछ महान विद्वान पृथ्वी के आकार, उसकी परिधि और ब्रह्मांड में उसकी स्थिति को समझने के लिए लगातार अध्ययन कर रहे थे। मध्यकालीन भारत और इस्लामी दुनिया के खगोलविदों का उद्देश्य केवल तारों की गिनती करना नहीं था, बल्कि यह जानना भी था कि जिस पृथ्वी पर हम रहते हैं, वह वास्तव में कितनी विशाल है।

11वीं शताब्दी के दौरान, जब उत्तर भारत के कई भागों में राजपूत शासकों का प्रभाव था और उत्तर-पश्चिम में ग़ज़नवी सत्ता मजबूत हो रही थी, उसी समय एक ऐसे महान विद्वान का उदय हुआ जिसने विज्ञान की दुनिया में अमिट छाप छोड़ी। उनका नाम था अल-बिरूनी (973–1048 CE)। वे केवल एक Astronomer ही नहीं, बल्कि Mathematician, Geographer, Historian और Philosopher भी थे। भारत आने के बाद उन्होंने यहाँ की भाषा, संस्कृति और वैज्ञानिक परंपराओं का गहराई से अध्ययन किया। सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि उन्होंने किसी आधुनिक तकनीक का उपयोग किए बिना केवल गणित और प्राकृतिक अवलोकन के आधार पर पृथ्वी की त्रिज्या का अनुमान लगाया। पहाड़ी की ऊँचाई और क्षितिज के कोण का उपयोग करके की गई उनकी गणना आधुनिक वैज्ञानिक आँकड़ों के अत्यंत निकट मानी जाती है।

उस समय यात्रा करना अत्यंत कठिन था। अधिकांश लोग अपने नगर या राज्य से बाहर कभी नहीं निकल पाते थे। ऐसे दौर में पृथ्वी के वास्तविक आकार की कल्पना करना भी आसान नहीं था। फिर भी उस समय के Astronomers और Geographers लगातार आकाश और पृथ्वी दोनों का अध्ययन कर रहे थे। उनके लिए खगोल विज्ञान केवल ग्रहों और तारों का ज्ञान नहीं था, बल्कि Navigation, समय की गणना और पृथ्वी की संरचना को समझने का भी महत्वपूर्ण माध्यम था।

9वीं और 10वीं शताब्दी में अब्बासी ख़िलाफ़त (Abbasid Caliphate) के शासनकाल में बगदाद पूरी दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञान केंद्र बन चुका था। यहाँ वैज्ञानिकों ने पृथ्वी की परिधि मापने के लिए विशेष अभियान चलाए। वे रेगिस्तानों में लंबी दूरी तय करते, सूर्य की ऊँचाई मापते और गणितीय सूत्रों के आधार पर पृथ्वी के आकार का अनुमान लगाते थे। यह कार्य इतना कठिन था कि कई बार एक प्रयोग पूरा करने में महीनों लग जाते थे, लेकिन ज्ञान की खोज कभी नहीं रुकी।

भारत में भी पृथ्वी और ब्रह्मांड को समझने की परंपरा अत्यंत प्राचीन रही है। महान गणितज्ञ और Astronomer आर्यभट्ट (476–550 CE) ने अपने ग्रंथों में स्पष्ट रूप से बताया कि पृथ्वी गोल है और अपनी धुरी पर घूमती है। उन्होंने यह भी समझाया कि दिन और रात का कारण सूर्य का घूमना नहीं, बल्कि पृथ्वी की गति है। उनके इन विचारों ने आने वाली कई पीढ़ियों के भारतीय विद्वानों को नई दिशा दी।

12वीं शताब्दी में भास्कराचार्य द्वितीय (1114–1185 CE) ने ग्रहों की गति, समय की गणना और पृथ्वी से उनके संबंधों पर विस्तृत अध्ययन किया। वे एक महान Mathematician और Astronomer थे। उनकी पुस्तक सिद्धांत शिरोमणि भारतीय विज्ञान की सबसे महत्वपूर्ण कृतियों में गिनी जाती है। उनके कार्यों से यह स्पष्ट होता है कि उस समय भारत में गणित और खगोल विज्ञान एक-दूसरे के पूरक विषय थे।

15वीं शताब्दी में मध्य एशिया का समरकंद वैज्ञानिक अनुसंधान का प्रमुख केंद्र बन गया। यहाँ उलुग बेग (1394–1449 CE) ने एक विशाल Observatory का निर्माण कराया। उनका उद्देश्य केवल सितारों की सूची तैयार करना नहीं था, बल्कि पृथ्वी से दिखाई देने वाले आकाश का अत्यंत सटीक वैज्ञानिक मानचित्र बनाना भी था। उन्होंने जिन उपकरणों का निर्माण कराया, वे उस समय दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिक यंत्रों में गिने जाते थे।

यदि आज हम Google Maps, GPS और Satellite Navigation जैसी तकनीकों का उपयोग करते हैं, तो यह समझना आवश्यक है कि उनकी बुनियादी सोच सदियों पुराने वैज्ञानिक प्रयासों से जुड़ी हुई है। मध्यकालीन खगोलविदों के पास आधुनिक तकनीक नहीं थी, लेकिन उनके पास अद्भुत धैर्य, गहरा गणितीय ज्ञान और ब्रह्मांड को समझने की अटूट जिज्ञासा थी। वे वर्षों तक आकाश का अवलोकन करते, प्रत्येक गणना को बार-बार परखते और फिर अपने निष्कर्ष लिखते थे।

आज NASA कुछ ही क्षणों में पृथ्वी और ग्रहों से जुड़ी जानकारी प्राप्त कर लेता है। लेकिन एक समय ऐसा भी था जब किसी एक वैज्ञानिक निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए महीनों की यात्रा, कठिन गणनाएँ और वर्षों का अवलोकन करना पड़ता था। यही कारण है कि मध्यकालीन भारत और इस्लामी दुनिया के खगोलविद विज्ञान के इतिहास में विशेष स्थान रखते हैं। उन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद ऐसे प्रश्न पूछे, जिनके उत्तर आधुनिक विज्ञान आज भी खोज रहा है।

जब भी हम रात के आकाश में चमकते हुए सितारों को देखते हैं, तो हमें केवल उनकी सुंदरता ही नहीं, बल्कि उन महान विद्वानों की अथक मेहनत भी याद करनी चाहिए जिन्होंने सदियों पहले यह जानने का साहस किया था कि पृथ्वी कितनी विशाल है, आकाश कितना अनंत है और इस विराट ब्रह्मांड में मानव का वास्तविक स्थान क्या है।

लेखक: Nasir Hussain (Nasir Buchiya)
Website: World Wide History
संदर्भ: https://hindimewati.blogspot.com

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